Wednesday, November 27, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३३९ -- एक होनहार तेजस्वी को ----पथिक अनजाना

एक होनहार तेजस्वी को जन्म
से युद्धकलायें सिखाई जाने लगी
पहुँचते पहुँचते युवा हुआ तैयार
प्रवीण तत्पर युद्धार्थ वहइंसा था
जब वक्त मैदाने जंग का आया
सामने दुश्मन मौजूद तैयार हुआ
प्रारंभिक युद्ध कलायें हुनरों के
साथ जा पहुँचा जब विजयकरीब
हारते देख गैर को तभी गुरूजन
बुजुर्गों ने कहा कि यह पाप होगा
पेशोपेश में लगा युवा विचारने
वर्षों से तैयारी इसी हेतू किया था
ऐसी ही स्थिति बनाई इंसान की हैं
जमीन के खुदा रूपी बुजुर्गों ने
किस्मत में खुदा ने सितारे ग्रह
ऐसे उसे बख्शे वह पाप करता रहे
फंस ऐसी परिस्थितियों में इंसान
निर्देशानुसार जब पाप करने लगा
ईश्वर समुदाय सगे संबंधियों ने
पापी सजायोग्य फतवा दिया
रब के बेहूदे अन्याय का शिकार
 हर इंसा जीवन पर्यन्त होता हैं
ले शस्त्र हाथ में चुनौती साथ में
जंग--मैदान में सामाजिक
आदेश का पालन करते जायें
ब्लाग --  राह  ए जिन्दगी
पथिक अनजाना


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