पाने को अबोध बाल ज्यों रहता है
कोई जब बन जाता विद्धान या धनी
काष्ठ पर रखे हुये बेजुबां कागज के
टुकडे पर खींचते रेखायें वास्तुकार
की तरह बालक की रेखायें संवारते
जो भविष्य में इक मोहक दर्शनीय
बन आश्रयस्थली छाया बन जाती है
ब्लाग - राह –ए --- जिन्दगी
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सतनाम सिंह साहनी ( पथिकअनजाना)
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