Friday, November 29, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३४१ - हर सांस के दौरान ----- पथिक अनजाना

हर सांस के दौरान हर कदम पर
रहता सब तरफ घोर अंधियारा हैं
वाकिफ इंसान अगली सांस में
संभावित प्रक्रियायें नही जानता हैं
जानता अगले कदम अगले में
क्षण क्या पावे क्या खो जावेगा रे
किसके दिल में क्या क्यों कौनसा
जनून किस दिलोदिमाग में अंकित
इतनी घोर परीक्षा व लम्बा जीवन
बेशुमार कर्ज फर्ज मर्ज इसने पाये
खुदा की उम्मीदों में खरा हर इंसा
परीक्षाऔं में कैसा तेरा होता न्याय
इंसान तो अंधियारे का वासी होता
वह फैसला जिन्दगी कैसी बनाई हैं
तराजू करता इंतजार इंसान सन्देह
सागर में क्यों नही खुदा शरण जाये
लडने को शस्त्र-शास्त्र नही वह जाने
न सच्चा रहनुमां जो राह उसेदिखाये
ब्लाग --  राह –ए --जिन्दगी
पथिक अनजाना


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