मिटावेंगे मिट जावेंगें मिटादेंगें
इंसानी हुंकार का आधार क्या हैं
किस औकात पर भरता यह हुंकार नही समझे हम आज तक हैं
जबकि मिट जाता स्वंय व मिटता
इसकी हुंकार व शरीर यहाँ हैं
रहता हर घडी गैरों को मिटाने के स्वपनों में मिट जाता
खुद हैं
फर्क को समझें आप यहाँ इंसान खुद मिटता हैं न.कि मिटाता हैं
जो मिटाता वह चुप रहता व जो मिटता वही शेर तो दहाडता हैं
जानते तथ्य बुद्धिजीवी क्यों फिर शेरों से पथप्रदर्शक डर
जाते हैं
मिटने वाले शेर दहाडते ये क्यों इंसानों के खैरख्वाह कहलाते
हैं
तथाकथित हास्यपूर्ण बुद्धिजीवियों के समक्ष इंसान सिर
नंवाते है
हर इंसान जीवन जंग में ज्ञानी होता क्यों यहाँ बुद्धि खो
जाते हैं
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
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