Saturday, November 30, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३४२ - रे मर्द पीढी दर पीढी --------- पथिक अनजाना

रे मर्द पीढी दर पीढी भूली कहाँ अपनी मर्दानगी
प्रेमवर्षा कर क्रोधमयी नैन दिखाती अर्धांगनी
तले पैरों के महबूबा के तेल मले दबावे पैर रात
दिन गुजरता कमाने को धन पडती रातें जागनी
आश्रयदाता मर्द को पडती हैं शांत छाया मांगनी
कोख से गुलाम जन्मे मातायें खोजे कहाँ वीरांगना
ब्लाग --  राह  ए जिन्दगी
पथिक अनजाना
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