Saturday, December 21, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३६३ कुछ भी अचम्भा यहाँ नही ---- पथिक अनजाना

कुछ भी अचम्भा यहाँ न  अब मुझे तो लगता हैं
न व्यवहार व बाजार न प्यार व मिलते चाटुकार
न परिवार, न विचार न हास्य दुख को मैं विचारू
नजर पडी जहाँ वहाँ सब लिये मेरे अनबूझ पहेली
थाह राह चाह बाँह अगाह इक नई मिली झमेलीहैं
सही कहा किसी ने वाक्य एक प्रभाव अनेक होते
“यह वक्त बीतजावेगा” को पढ कुछ हंसते कुछ रोते
बीत रहा, बीत जावेगा बीता वक्त अतीत होता हैं
त्यागना विचारना सँवारना दिल क्यों चैन खोता हैं
सोचता कल, क्यों नही आज चैन की नींद सोता हैं
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी

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