Tuesday, January 14, 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ३८७ - कहा तो सिर हिला दिया -- पथिक अनजाना

या खुदाया आखिर मान गया तेरी कयानात अजब गजब हैं
फैली सौगातें विभिन्न जीवों की भरमार मौसम अनेक प्रकार
गहन अचम्भा इंसा नामक जीव को देख परखव समझ पाया
विचार इसके दुर्लभ शुद्धता की आकाशी ऊचाँईयाँ देवत्वसमाया
पापों के समुद्र तल पर विचरता हर सांस से लेता स्वार्थ छाया
रहता टकराता देवत्व दैत्यता के दोनों के किनारों से सर्वदा
हैरां परेशां हुआ क्यों जामा पहनने को मैं ललायित हो गया
जाना निकृष्टता आदर्शता तारीफे ढंग से एक में बसाया हैं
जरूरत कुछ देखने की धरा पर भ्रमों लोभों की माया छाया

पथिकअनजाना

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