Monday, November 25, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३३७ - इंसानी सोच देखो ----- पथिक अनजाना

इंसानी सोच देखो तेरी रहमतों
को भी व्यापारिक वस्तु बनाया
मैं मस्त हुआ बैठ किनारे पर
आन्नद जिन्दगी का लेता रहा
दौराने यात्रा के इंसानी जिन्दगी
इंसा ,पृथ्वी के नजारे खूब देखें
निष्कर्ष माना खुदा की कृतियाँ
खेल जिन्दगी का जबरदस्त है
अभी अभी रात के अंधियारे में
इक नई दुनिया यहाँ जाग उठी
झूठी आशाओं प्रसन्न निराशाओं
आरोपों असंतोषों की आग भडकी
घबराया हैं आराजकता का अंधेरा
सिमट रहा अस्तित्व खो गया हैं
यकीं मुझे इक दिन घडा भरेगा
इंसान सत्यता पर होगा खडा
निर्माता, निर्णयों की परिभाषा
जानेगा हंसते स्वीकार करेगा
ब्लाग --  राह  ए जिन्दगी
पथिक अनजाना



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