Sunday, November 24, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३३६ – बने हैं हम बंजारा ---- पथिकअनजाना

दिल को कैसे समझायें हम
न कुछ भाता न रूकते पांव
मंजिल दर मंजिल भटके हैं
न सकून न मिली छांव हमें
जिन्दगी गंवाई बन अनजाना
न जानादिल किसका दीवाना
न अपना किसी को हैं माना
जीते लडते रहे बनाके बहाना
फिर कहाँ जायें न कभी जाना
न खुद न किसी ने हमें संवारा
लोग कहते बने हैं हम बंजारा
मंजिल नाम पता समझे नही
चलते रहे बन पथिक अनजाना
ब्लाग --  राह  ए जिन्दगी
पथिक अनजाना


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