दिल को कैसे समझायें हम
न कुछ भाता न रूकते पांव
मंजिल दर मंजिल भटके हैं
न सकून न मिली छांव हमें
जिन्दगी गंवाई बन अनजाना
न जानादिल किसका दीवाना
न अपना किसी को हैं माना
जीते लडते रहे बनाके बहाना
फिर कहाँ जायें न कभी जाना
न खुद न किसी ने हमें संवारा
लोग कहते बने हैं हम बंजारा
मंजिल नाम पता समझे नही
चलते रहे बन पथिक अनजाना
ब्लाग -- राह ए जिन्दगी
पथिक अनजाना
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