अतीत के जवां जिस्म जा पहुँचे हाशिये पर
जगह उनकी लेने को नई पौध जवां हो गई
सपनों में खोये वृद्धगण देखते देखते यहाँ पर
होकर असहाय वे तो अपने हक सब खोने लगे
पुरूष समझावे बारबार अर्धांगनी को अपनी कि
न हो विचलित न कर लालच न रख आशा तू
क्रम से होता हैं स्थान सदा से वह एक ही हैं
फर्क आज हम जिस स्थान पर आकर खडे हैं
कल कोई और आ उस स्थान पर खडा होवेगा
यह दुनिया पूर्व से चलती क्यों करती निराशा है
ब्लाग - राह –ए
--- जिन्दगी
https://pathicaanjana777.blogspot.com
सतनाम सिंह साहनी ( पथिकअनजाना)
No comments:
Post a Comment