Sunday, November 3, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक --३१५--- कभी काँधा नसीब ---सतनाम सिंह साहनी

मुझे नही हुआ सच्चे यार का कभी काँधा नसीब
रहा ताउम्र में इस खुदाई सौगात से वंचित गरीब
घेरे रहे जबकि कहे जाने वाले शुभचिन्तक अजीब
जंगे जिन्दगी तूफां बहुतेरे न दिखी मंजिल करीब
जिन्दगी में पहचान न सके मंजिल को कभी हम
जिसे सोचा शायद मंजिल दुनिया लुटेरों की मिली
मंजिल विचारनी छोड दी राह पथिक बनकर चली
ब्लाग -  राह –ए ---  जिन्दगी
https://pathicaanjana777.blogspot.com
सतनाम सिंह साहनी ( पथिकअनजाना)




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