मुझे नही हुआ सच्चे यार का कभी काँधा नसीब
रहा ताउम्र में इस खुदाई सौगात से वंचित गरीब
घेरे रहे जबकि कहे जाने वाले शुभचिन्तक अजीब
जंगे जिन्दगी तूफां बहुतेरे न दिखी मंजिल करीब
जिन्दगी में पहचान न सके मंजिल को कभी हम
जिसे सोचा शायद मंजिल दुनिया लुटेरों की मिली
मंजिल विचारनी छोड दी राह पथिक बनकर चली
ब्लाग - राह –ए
--- जिन्दगी
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सतनाम सिंह साहनी ( पथिकअनजाना)
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