Sunday, December 15, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक-३५७ - कर्मों पर करो गौर --- पथिकअनजाना

कर्मों पर करो गौर कृपया छोडो धर्म का छोर रे
इंसान जाने अनजाने हर बहाने यह शिक्षा पीता हैं
फल कर्मों का होता पाते सदैव लेखाधार कर्म हमारे
कहा किसी ने सत्य हर पल जागते रहो,होश में रहो
मजे की बात जागा इंसा भी लगे मानो सोया रहता
सोता नही तो मायावी चक्रों में क्यों जा यह फंसता
मानवीय कृति म़ें यह अचंभा देखके पथिक हंसता हैं
ग्रन्थ जगाते,ज्ञानी जगाते पर खुद भी सोये रहते हैं
किसी को कपडों में सुलाया किसी को ऐश ने रिझाया
जमीं पर आ देख ताउम्र हास्य नाट्य आनन्द आया

No comments:

Post a Comment