सुनी यही कहावत सदा बचपन
से खिसयानी बिल्ली खंभा नोचें
गुजार कर पूर्ण जीवन सत्य यही
पाया नही विरूद्ध इसके कुछ सोचें
चाहे समुदाय
शीर्षस्थों के मध्य में
छिडी जंगया
दिखायें आडम्बरी रंग
किसी बिसात पर हो भैंट परिवार
या टूटे सपनों का हो गहरा विचार
भूलभलैंया में फंसी मानवता रहनुमां
पथगामियों हेतू अनर्थ सोचते
हैं
रह जग में तुम कान दिलदिमाग
व तैनात हर घडी ही आंखें रखो
सुनो कानों से बात साथ आवाज
आसपास परखो तौलो विचारों को
आंखें सदैव सतर्कता
से रहे भेदती
गहरे जा थाह लो विचारों
का ऐसा
क्यों उसने कहा यहक्रिया अतीतफल
या किसी भावी घटना की यह कडी
किसी बात का फैसला न खुद करें
सदैव खुदा पर टालना ही उचित हैं
कहा किसी ने हर पल यहाँ किसी
नबूझी योजना तहत घटित हो रहा
साक्षी बनो क्यों यार हृद्य खो रहा
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
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