मानव जाति तो
अपने शयनकक्ष में भी आडम्बर पालती हैं
मुलाकातियों
.रिश्तों व जीवनसाथी को साथ तौल जाती हैं
सभी को यहाँ
स्वार्थ की तुला पर इंसा व्दारा तौला जाता हैं
न बख्शा खुदा
को ले उसी से दे उसी को दानवीर कहलाता
शर्म आती झुकता
सिर मेरा जब ज्ञानी करा यह खुश होते.हैं
पागल इंसान क्यों
करे यकी ज्ञानी तुझे वैतरणी पार करावेंगें
जैसा पिता
उनका,आप क्यों भूले पिता को कैसे तुझे समझावें
घर बाहर
दरबार खुदा के क्यों हर जगह आडम्बर याद आवें
आडम्बरी इतना कि हर सैयां से व शैया पर भी यह सूझ जावें
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
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