Monday, December 23, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक – ३६५ - मेरी क्या मजाल हैं? ---- पथिक अनजाना

होती नियत,नियति, उन्नति,मति,गति,क्षति के दायरे में
इंसान की सारी दैनिक प्रक्रियायें,  सजायें,रजाये निहित
विधि जैसी भी अपना लो विधान कैसा भी तुम बना लो
खुद मानो बातें किसी की,कितनों को तुम तारे दिखालो
प्रसारित,प्रचारित,प्रभावित,प्रताडित तुम कहीं दिखा लो
विचारित,विस्तारित करो या कही कुछ विभाजित करो
होगा वही जो निर्धारित--दुकान,दीवान सजाना बवाल हैं
पथिक अनजाना पूछे कैसी जिन्दगी बीताने का ख्याल
नही पथिक दबाव देता यह तुम्हारा आत्मिक सवाल हैं
तौबा तौबा करे पथिक राह दिखाऊ मेरी क्या मजाल हैं?

पथिक अनजाना ( सतनाम  सिंह  साहनी)

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