अभिव्यक्ति क्रमांक --३०१- कशिश शब्द का ----पथिक अनजाना
मुल्क की कशिश समुदाय की कशिश में इंसा खोया
जाति भाषा नाते रिश्ते व परिवार की कशिश में रोया
अंह की ऊची दीवारों
में कतरा ए खून सिसकता हैं
यादें
नहीं छूटती बाते क्यों टूटती आशा बिक जाती हैं
चोट नरम दिल पर होती कलम से हो बिखर जाती हैं
पथिक अनजाना
No comments:
Post a Comment