Thursday, November 21, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ३३३ - बनाना चाहोगे किसी अनमोल को आदर्श -- - पथिक अनजाना

माना तुम बनाना चाहोगे किसी अनमोल को अपना आदर्श
तुम सही हो जो जा हीरों को कोयले की खदान में खोजते हो
दुकानों पर बिकने वाले हीरे अंहकार के ताज में जडे जाते हैं
खदानों की खाक में खोजे हीरे ही दुनिया को रोशन करते हैं
जिसे अनेकों ने चाहा सिर पर बैठाया वह आदर्शता गँवाते हैं
चाटुकारिता की अंह रूपी भंवरजाल में लोग उन्हें  फेंक जाते
अतः मेरी राय मानो सही आदर्श खोजो तुम चित्रों में कहीं
आदर्श साथी पथप्रदर्शक राही खोजने होंगें विचित्रों में जाकर
आईने के काँच को हीरे का टुकडा समझ लेना कहीं मित्र
हीरा आईने को काटता व देता रोशनी बेमोल वो कहलाता हैं
हीरा मान  बढाता जग में आईना  इंसा को  सच्चाई बताता हैं
ब्लाग --  राह  ए जिन्दगी
पथिक अनजाना


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