Tuesday, December 10, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ३५२ - क्या सच क्रान्ति आ रही हैं ? ----- पथिक अनजाना

माना कि हम मंजिल शायद देख नही पायेंगें
हमवतनों के विचारों में तब्दीली आती जा रही
जागो काली रात गुजर गई हैं मेरे वतन से हैं
उमडता उफान फूटती किरणें दिखे चलती राह
अनजानी खुशियों से सरोबार खुद को पा रहा
जागते वतनवासी व देखते लुटरे चले जा रहेहैं
मृत्यु-शैया पर लेट रावण नीतिगुण सिखा रहे
मानो भ्रष्ट साथियों साथ सूर्य किरणें छिपा रहे
गर बादल छा गये तो नये क्रान्तिवीर आ रहे हैं
अब लूटने न देंगें देश को जनविचार बता रहे हैं
नये एहसास की किरणों से ग्राम जगमगा रहे हैं 

- ब्लाग --  राह   जिन्दगी

पथिक अनजाना
यदि अभिव्यक्ति को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें



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