एक अचम्भा मैंने पाया हैं यत्र
तत्र सर्वत्र संसार में ही
ज्यादा चतुर आडम्बरी झूठा सम्मान पाते बाजार में हैं
लाख मुखौटे लगावें वे मासूमियत को चेहरे
से टपकावें
चाहे मद्धेनजर स्वार्थ को रख सामने कोई कह न पावे
किन्तु औकात क्या विश्वासी कितने सब जान जाते हैं
शकुनी कितनी चाल चले पर निगाहों से बच न पाते हैं
- ब्लाग -- राह ए जिन्दगी
पथिक अनजाना
यदि अभिव्यक्ति को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया
अग्रेषित करें
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