भुला न पाते हम नाम यारों का दिलोदिमाग से
माया छाया में आप,जीवन धूप में हम देते थाप
हम रहे चलते सदा धूप- छांव में हरेक राह पर
खोजते रहे राह आप अपनी ही अनेकों चाह पर
जूझे आप कुछ और कुछ --,जूझे हम भाग्य से
धिक्कारता हैं दिलेनादाँ खेले क्यों तुम आग से
लोग कहते हम दीन व दुनिया से दूर हो गये हैं
न समझे दिल यह चर्चें क्यों मशहूर हो गये हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम
सिंह साहनी)
No comments:
Post a Comment