Thursday, December 26, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३६८ - पैरों मे जूते भी --- पथिकअनजाना

क्यों आप लोग मेरे कदमों कार्यों का विश्लेषण करते हैं
कहते न समझे हम उद्धेश्य पथिक तुम्हारे ब्लागों का हैं
कहा अतीत के गुम पन्ने करना जाहिर काम आपका हैं
मैं बयाँ वही करता जो पथिक जिन्दगी सफर में देखता
न विचारूं लक्ष्य,पथिक किसी मंजिल पर रूकते नही हैं
यह बुद्धि, समझ आपकी जो इशारों को समझ सकते हैं
क्यों मैं सोचू कि समझे,ज्ञानी हैं का आप मान करते हैं  
आप चाहे न चाहें पथिक न किसी आकर्षण रूका करते
कदमों के नीचे पैरों म़ें जूते भी इंसान के हुआ करते हैं
हो बैचैन मेरे जूतों में गर आप अपने पैर पसार के देखें
पता चले किन राहों,किन हालातों में जिन्दगी दी गुजार
यकीनी रूह आपकी कहेगी बन्दे करते तुझे सलाम हजार

पथिक अनजाना ( सतनाम  सिंह  साहनी)

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