कुछ देखे मौनधारी
मानवीय स्वभाव इस जहान में
लूटकर के तनमन धन वे भोले मासूम बन जाते हैं
कुछ चीखते चिल्लाते बहुत व भीड करीब जुटाते हैं
वक्त आने पर नेताओं की तरह जेलबन्द कराते हैं
भविष्य में कभी दाल गली तो मंत्रीपद पा जाते है
करूं अनुरोध न घसीटों बच्चों को स्वहित जंग में
सच्ची मानवता पाता हूं इनके चेहरों व हर रंग में
कुछ युवां बुजुर्ग सदाबहार इंसान देखे यार जहाँ में
भला न किया कभी किसी का पर श्रेय लेने आतेहैं
कुछ जुगाड समर्पण कर कही, मानपदक सजाते है
कुछ कर निस्वार्थ सेवा मान, धन से दूरी बनाते हैं
कुछ लोभ से रख धन पर पदक वापिस करजाते हैं
हैरान यह कौन से जीव हैं धरा पर कहाँ से आते हैं
असफल हुये पदक चारे हेतू मीडीया संग बैठ जातेहैं
खुशहुये इक नई श्रेणी के जीव की भारत में पाते हैं
पथिक अनजाना ( सतनाम
सिंह साहनी)
No comments:
Post a Comment