Wednesday, December 4, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक ३४६ -- नही समझते- ------ पथिक अनजाना

नही समझते उम्र के अन्तिम
इस पडाव में हम आकर अब
जीवन भर का निचोड जो कि
हम लिखते क्यों जाते रहते हैं
न पढने की इच्छा देखी कहीं
नमालुम यह किस काम आवेंगें
मेरी सारी मेहनत के क्या पुष्प
बदनसीबरूपेण याद किये जावेंगें
अग्निदाह जलप्रवाह होगा
ख्यालों की मजार यह कहलावेंगें
क्या मेरे समान लेख मेरे लेख                                             
खिताब व्यर्थ का शीर्षक पावेंगें

- ब्लाग --  राह   जिन्दगी

पथिक अनजाना

यदि अभिव्यक्ति को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया अग्रेषित करें

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