किसे सामने पाकर
चेहरा तेरा खिल गया
लगता कुछ काफी इंतजार के बाद है पाया
खोज थी जिस खजाने की तुझे सामनेआया
थी जिन्दगी नीरस अबतक बहार को पाया
रे पगले बहार का इंतजार मत किया करो
क्यों भूलता बहार बाद पतझड भी आता हैं
जिनका इंतजार यहाँ बेसब्री से कर रहा था
निश्चित दोनों मेंसे कोई एक बिछुड जावेगा
होके हालातों से मजबूर दूजा न रोक पावेगा
बेहत्तर नआने की खुशी न जाने का गम हो
मुस्कानों का बना स्थायी बसेरा गर दम हो
- ब्लाग -- राह ए जिन्दगी
पथिक अनजाना
यदि अभिव्यक्ति को रूचिकर व विचारणीय मानते हैं कृपया
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