नजर अजब इंसान की ताउम्र जूझता
प्रशिक्षण लेता रहता हैं
देता नही निस्वार्थ प्यार किसी को ध्यान
जख्मों पर रहता हैं
ज्ञान सजा पुस्तकों व जुबां पर दिल इसका
कुछ और कहता हैं
यही फासला जा नासूर बनाता जिसको यह तो जख्म
कहता हैं
गिनता, देखता, पछताता नही,- दिये तूने जो
जख्म गैरों को हैं
भविष्य के लिये डरता, मिले जख्म याद करता,
दिये बिसारता
जो दे रहा नित्य जख्म प्रकृति को, न तू
उन्हें कभी विचारता हैं
रोगी तू भीतर बाहर से,फिर क्यों हमसफरों
हेतू कब्रें उसारता हैं
-------- पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)
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