Wednesday, January 1, 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ३७४ -- कुछ और कहता हैं -- पथिक अनजाना

नजर अजब इंसान की  ताउम्र जूझता प्रशिक्षण लेता रहता हैं
देता नही निस्वार्थ प्यार किसी को ध्यान जख्मों पर रहता हैं
ज्ञान सजा पुस्तकों व जुबां पर दिल इसका कुछ और कहता हैं
यही फासला जा नासूर बनाता जिसको यह तो जख्म कहता हैं
गिनता, देखता, पछताता नही,- दिये तूने जो जख्म गैरों को हैं
भविष्य के लिये डरता, मिले जख्म याद करता, दिये बिसारता
जो दे रहा नित्य जख्म प्रकृति को, न तू उन्हें कभी विचारता हैं
रोगी तू भीतर बाहर से,फिर क्यों हमसफरों हेतू कब्रें उसारता हैं

 --------  पथिक   अनजाना (सतनाम सिंह साहनी)

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