पुरूष के लिये हर बीत गया दिन जा स्वर्णिम यादें बन जाता हैं
जो आज व बदत्तर भविष्य हेतू सदा वह सहमा सा रह जाता
हैं
शारीरिक श्रम मानसिक उलझनों का या असंतुलित आर्थिक क्षेत्र
माता-पिता को सम्हाल कभी पत्नी को सहरा,समस्याओं में खोता
कभी समकक्ष, कभी उच्च कभी मातहतों से उलझ शांति हेतू रोता
सपने बचपन से देखता,दौड रहा, मरूस्थल मे सदैव वह सोता है
प्रतिदिन खुद को संघर्ष क्षेत्र में लुटा पाता,लूटता या लूटा
जाता हैं
पुरूष हेतू जिन्दगी सफर मात्र सिरपर बन कर
डराता रहता हैं
जो सिरपर माने जीवन बोझिल,माने सबको यात्री तो सुखी होताहैं
कहता पथिक रे पगले झूठी शान,मान अपमान लिये क्यों रोता हैं
पथिक अनजाना(सतनाम सिंह साहनी)
No comments:
Post a Comment