Friday, January 3, 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ३७६ - जो गिरता हैं राह --- पथिक अनजाना

जो गिरता राह में वही जो चलने वाले को मान दे पाता हैं
जो गिरा तो न उठा वह चलने वालों का नेता बन पाता
जो गिरता उठता रहे वो चलने वालों का आदर्श बनता हैं
जो सांसैं सदा छांव में लेवे वो आन्नद धूप का कहाँ पाता हैं
न धूपछांव न राह किनारे की फैली छटाओ से जो जुडे कभी
राही सब हैं जीवन राह के पर, यह अनजाना कहलाते तभी
पथिक अनजाना  ( सतनाम सिंह साहनी)


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