Thursday, January 9, 2014

अभिव्यक्ति क्रमांक ३८२ – जनकल्पना सजाने दें -- पथिकअनजाना

जीवन में घटना तो अपने क्रम से घटती होती हैं
इस श्रृंखला पर कैसे भी आपका वश नही होता हैं
वश में यहआप इसे दिलोदिमाग मे कैसे रखते हैं
प्रभाव चेहरे व बातों के माध्यम से कैसे दर्शाते हैं
चेहरे को पढ मौजूदा जन दिली तूफां भांप लेते हैं
हस्त मुद्रायें खीझ आपकी जगजाहिर कर जाती हैं
जीना सरलसुखद तभी जब नियंत्रित आप हो जायें
भाव आन्तरिक न प्रकट करे जो बीता बीतजाने दें
मुस्करायें,कुछ आपका नही. जनकल्पना सजाने दें

पथिकअनजाना  (सतनाम सिंह साहनी)

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