क्या लिखूँ कुछ लिखने को अब
विचारों में बाकी न रहा
थमे पैर व अछूते हुये हम अपने बनाये कारवाँ के लिये
दिल से मशगूल थे हम बचाने आदर्श बनाने को कारवाँ
कसौटी धन की हैं हमारे विचारों त्यागों की कीमत नही
कहते उन्हें क्या लेना देना नकारे गये औकात भूले हम
हम तख्तोताज से क्यों बेआबरू हो उतारे गये मिले गम
जिन्होंने जग में जगह चापलूसी येनकेन प्रकारेण बनाई
दुनिया उसकी हुई राह मेरी पथिक अनजाना की कहलाई
ब्लाग -- राह --
ए --- जिन्दगी
सतनाम सिंह साहनी (पथिकअनजाना)
No comments:
Post a Comment