Thursday, November 7, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक --३१९-- - तिरस्कृत होकर अपनों के--- सतनाम सिंह साहनी

तिरस्कृत होकर अपनों के बीच से तुम जब खुद को
मित्र जब कभी स्वंय को तुम अकेला पाने लगते हो
करो दरखास खुदा से कि वे बदले तकदीर तुम्हारी
दोस्तों अपनों की नजर से तुम हल को देख पाते हो
ब्लाग ---  राह ---ए --- जिन्दगी

   पथिक  अनजाना

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