Thursday, November 14, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक -- ३२६ -- - समूह हास्य न बनाओ --- पथिक अनजाना

अपनी समस्या को तुम समूह हास्य न बनाओ
इसे तुम अपने जीवन की अमावस्या न बताओ
जिओ ऐसेजैसे अस्तित्व समस्या का था ही नही
राह किनारे  दिक्कतें व्यवहार कब न तुमने सहे
दुनियायी खेल को दिमाग से न कि दिल से यहाँ
जिओ दिल से यहाँ तुम कभी दिमाग से न जियो
भविष्य कीचिन्ता न हावी होने दो अतीत खोने दो
रे बाँवरे अगली पिछली सांस हाथ नही वश हैं तेरे
देखा न स्वर्ग नरक जीवन में हैं मौजूदगी के फेरे
ब्लाग  --  राह –ए --- जिन्दगी


              पथिक  अनजाना

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