Saturday, November 16, 2013

अभिव्यक्ति क्रमांक - ३२८ - परिवारिक जीवन सामाजिक -- पथिक अनजाना

पारिवारिक जीवन , सामाजिक हो या समुदायिक जीवन
खिन्न हो जाता यहृ हृद्य भीतरी हालात देख देख करके
परिवार में सत्ता हेतू पति –पत्नी क्यों शीतयुद्ध ग्रस्त हैं
सामाजिक नेतृत्व सदस्यों की हालातों पर जश्न मनातेहैं
समुदाय शीर्षस्थ  खौफ खुदा व गैरो का क्यों दिखाते हैं
मुझे किसी दर पर खुशी के दो पल मयस्सर न यहाँ हुए
बातें ऊची रातें लम्बी बहुतेरी इंसानों के यह क्या हश्र हुए
ब्लाग  --   राह –ए -जिन्दगी
            पथिक     अनजाना ( सतनाम सिंह साहनी)

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